HINDUSTAN NEWS TODAY, हरिद्वार। उत्तराखंड वन विकास निगम द्वारा गंगा तथा उसकी सहायक रवासन और कोटावाली नदियों में कराए जा रहे खनन चुगान कार्य में अनियमितताओं की शिकायत पर उठे विवाद ने जांच प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। शिकायतकर्ता ने निगम की प्रबंध निदेशक नीना ग्रेवाल को ईमेल से सूचित किया कि खनन में लगे वाहनों की फिटनेस अनुपस्थित है, सूर्यास्त के बाद अवैध निकासी हो रही है तथा बिना तौल और रॉयल्टी के सामग्री बाहर जा रही है।
शिकायत में आगे कहा गया कि उच्च अधिकारियों को जानकारी देने के बावजूद कोई संज्ञान नहीं लिया गया, जिससे हरिद्वार के लॉजिंग अधिकारी और कोटद्वार के क्षेत्रीय प्रबंधक की भूमिका संदिग्ध लगती है। इन अधिकारियों पर सीधे संलिप्तता के आरोप लगाए गए हैं।
प्रबंध निदेशक नीना ग्रेवाल ने 9 दिसंबर 2025 को पत्रांक 3966 के जरिए जांच के आदेश जारी किए। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से जांच की जिम्मेदारी उन्हीं अधिकारियों को सौंप दी गई, जिन पर शिकायतकर्ता ने संदिग्ध भूमिका और संलिप्तता का आरोप लगाया था।
यह निर्णय निगम की आंतरिक जांच व्यवस्था की निष्पक्षता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि आरोपित व्यक्ति द्वारा अपनी ही जांच करना न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है, जिससे जांच के परिणाम पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो सकते हैं।
वन विकास निगम की जिम्मेदारी नदी खनन में नियमों का पालन सुनिश्चित करना और रॉयल्टी संग्रह करना है। ऐसी शिकायतें खनन कार्यों में पारदर्शिता की कमी को उजागर करती हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह जांच कितनी गहराई तक जाती है और क्या इसमें कोई ठोस तथा निष्पक्ष कार्रवाई होती है।