सम्मेलन : उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन का शुभारंभ,

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HINDUSTAN NEWS TODAY, हरिद्वार। उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय के तत्वावधान में विदेश मंत्रालय (भारत सरकार) तथा केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के सहयोग से आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन का उद्घाटन रविवार को संस्कृत अकादमी के प्रेक्षागृह में हुआ।

कार्यक्रम की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम के सीधे प्रसारण से हुई। इसके बाद विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने स्वागत-गान प्रस्तुत किया। कुलपति प्रो. दिनेश चंद्र शास्त्री ने मंचासीन अतिथियों एवं सभी प्रतिभागियों का स्वागत किया।

मुख्य अतिथि एवं प्रदेश के संस्कृत शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने कहा कि संस्कृत साहित्य की जो धारा वेदों से निकली है, उसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। रामायण-महाभारत जैसे महाकाव्यों में वर्णित सामाजिक मूल्य आज के युग में भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उन्होंने जोर दिया कि विश्व की किसी भी समस्या का समाधान संस्कृत साहित्य में मौजूद है।

विशिष्ट अतिथि एवं महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने सम्मेलन के 18 तकनीकी सत्रों की तुलना श्रीमद्भगवद्गीता के 18 अध्यायों से की। उन्होंने संस्कृत को उत्तराखण्ड की प्रथम राजभाषा एवं भविष्य में राष्ट्रीय भाषा बनाने की दिशा में सामूहिक प्रयास करने की अपील की। साथ ही युवाओं से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को समझते हुए उसे अपनाने का आग्रह किया।

विदेश मंत्रालय की सचिव (पूर्व) डॉ. नीना मल्होत्रा ने कहा कि देववाणी संस्कृत में मन को परिष्कृत करने की अद्वितीय क्षमता है। भारतीय ज्ञान-परम्परा में आधुनिक विज्ञान के अनेक सिद्धांत पहले से मौजूद हैं; अब वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उसका अध्ययन जरूरी है।

संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक गैरोला ने संस्कृत को वैज्ञानिक चेतना एवं अध्यात्मिक दर्शन का आधार बताया और कहा कि आज के स्वार्थ-संघर्ष के दौर में यह करुणा, संवाद एवं विश्व-कल्याण का मार्ग दिखाती है।

सम्मेलन के अध्यक्ष एवं स्थानीय विधायक आदेश चौहान ने प्रधानमंत्री के नेतृत्व में संस्कृत के बढ़ते मान-सम्मान की सराहना की तथा इस संगोष्ठी से संस्कृत के प्रचार-प्रसार में नई गति मिलने की उम्मीद जताई।

कार्यक्रम में दो पुस्तकों का विमोचन किया गया:

  1. डॉ. श्वेता अवस्थी एवं डॉ. सुमन भट्ट द्वारा संपादित ग्रंथ
  2. डॉ. प्रकाश चंद्र पंत द्वारा अनूदित पुस्तक

विदेशों से पधारे संस्कृत विद्वानों का भी मंच पर सम्मान किया गया। इनमें फ़िजी, बहरीन, मलेशिया, मंगोलिया, थाईलैण्ड, बेलारूस, रूस, श्रीलंका, कज़ाखस्तान तथा यूनाइटेड किंगडम के विद्वान शामिल थे।

अंत में कुलसचिव दिनेश कुमार ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विभिन्न प्राध्यापकगण, संस्कृत अकादमी के अधिकारी, संस्कृत निदेशालय के प्रतिनिधि तथा बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ एवं संस्कृत प्रेमी उपस्थित रहे।

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