HINDUSTAN NEWS TODAY, हरिद्वार। हरिद्वार स्थित औद्योगिक क्षेत्र सिडकुल में एक अनूठा और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। हाल के महीनों में, कुमाऊं मंडल के जनसंपर्क अधिकारी (पीआरओ) को कुमाऊं रीजन के साथ-साथ हरिद्वार स्थित गढ़वाल मंडल की क्षेत्रीय प्रबंधक (आरएम) की जिम्मेदारी भी सौंप दी गई है। इस मामले ने प्रशासनिक तंत्र में कई सवाल खड़े कर दिए हैं, खासकर उस स्थिति में जब सामान्यत: यह दोनों पद अलग-अलग अधिकारियों के पास होते हैं।
2017 में कुमाऊं मंडल के उधमसिंह नगर में सिडकुल पीआरओ के रूप में नियुक्त हुए इस अधिकारी को हाल ही में गढ़वाल मंडल में हरिद्वार के सिडकुल के क्षेत्रीय प्रबंधक की जिम्मेदारी दी गई। यह बदलाव न केवल अधिकारियों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है, बल्कि इस निर्णय से जुड़े प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर भी सवाल उठ रहे हैं।
क्या है मामला? सिडकुल के क्षेत्रीय प्रबंधक पद पर एक उच्च पदस्थ अधिकारी की नियुक्ति की उम्मीद की जाती है, जो क्षेत्रीय औद्योगिक विकास और प्रशासनिक मामलों का कुशलतापूर्वक संचालन कर सके। लेकिन पिछले कुछ महीनों से कुमाऊं मंडल के जनसंपर्क अधिकारी ने दोनों मंडलों-कुमाऊं और गढ़वाल-की जिम्मेदारी संभाल रखी है। इसे लेकर कई सवाल उठ रहे हैं, खासकर इस तथ्य को देखते हुए कि यह पद अक्सर अलग-अलग अधिकारियों द्वारा संभाले जाते हैं।
लोगों के जहन में मुख्य प्रश्न घूम रहे हैं।
1.क्या शासन के पास योग्य क्षेत्रीय प्रबंधक नहीं हैं? यह सवाल अहम है, क्योंकि एक अत्यधिक महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्र के प्रशासन को संभालने के लिए क्यूं एक जनसंपर्क अधिकारी को नियुक्त किया गया, जबकि यह पद एक विशेष योग्यताधारी अधिकारी के लिए आरक्षित है।
2.क्या इस नियुक्ति से प्रशासनिक दक्षता प्रभावित हो रही है? हरिद्वार के सिडकुल में लगभग 1000 औद्योगिक इकाइयां हैं, जो राज्य को करोड़ों रुपये का राजस्व प्रदान करते हैं। ऐसे में क्या यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी एक जनसंपर्क अधिकारी को दी जा सकती है? क्या इस निर्णय से औद्योगिक इकाईयों का कुशल प्रबंधन प्रभावित होगा?3.क्या नियमों की अनदेखी की गई? क्षेत्रीय प्रबंधक के पद के लिए अलग से नियुक्ति की प्रक्रिया होती है, लेकिन इस मामले में उसे एक जनसंपर्क अधिकारी को सौंप दिया गया है। इससे संबंधित प्रशासनिक नियमों और प्रक्रियाओं पर भी सवाल उठते हैं।
सरकार के लिए चुनौती: यह मामला सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है, क्योंकि यह निर्णय शासन की पारदर्शिता और प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल उठाता है। जब राज्य सरकार के पास योग्य और अनुभवी अधिकारियों की कमी नहीं है, तो यह निर्णय कहीं न कहीं प्रशासनिक व्यवस्था और कार्यकुशलता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।