HINDUSTAN NEWS TODAY, हरिद्वार। राज्य औद्योगिक विकास निगम (सिडकुल) हरिद्वार के ग्रीन बेल्ट क्षेत्र में बरमूडा घास लगाने के कार्य में गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं। हम तो इस घास को लगाने की लूट ही कहेंगे। क्योंकि अधिकारी सरकारी बजट को कम खर्च में पूरा काम करने के लिए सरकार से प्रतिबद्ध है। लेकिन यहां तो सरकारी बजट पर महेंगी घास लगा दी गई, और गजब तो तब हुआ जब दो कोटेशन बिना तारीख डाले ही समिति ने अपनी तरफ से उसे फाइनल कर दी। एक कोटेशन पर छह जुलाई डाली गई है लेकिन उसपर समिति ने पांच अगस्त में अपनी संस्तुति दे डाली। सूचना के अधिकार अधिनियम (आरटीआई) में खुलासा हुआ है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, क्षेत्रीय प्रबंधक ने 104 रुपये प्रति वर्ग मीटर की ऊंची दर पर यह ठेका रुद्रपुर (उधम सिंह नगर) की एक फर्म को आवंटित कर दिया, जबकि लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) की अनुसूचित दरें (एसओआर) मात्र 17 से 28 रुपये प्रति वर्ग मीटर हैं। इसमें 18% जीएसटी जोड़ने पर भी दरें काफी कम बैठती हैं।
यह कार्य 6 अगस्त 2025 को आवंटित किया गया और फर्म ने मात्र 5 दिनों में 11 अगस्त तक इसे पूरा दिखा दिया। हैरानी की बात यह है कि 8 दिनों के अंदर ही 2 लाख 38 हजार रुपये से अधिक का पूरा भुगतान कर दिया गया, जबकि हरिद्वार जिले के सैकड़ों स्थानीय ठेकेदारों के भुगतान वर्षों से लंबित हैं। शिकायतकर्ता का कहना है कि इतनी जल्दबाजी और ऊंची दरें कार्य की गुणवत्ता पर सवाल उठाती हैं तथा स्पष्ट रूप से पक्षपात दर्शाती हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि हरिद्वार जैसे बड़े औद्योगिक क्षेत्र में कुशल स्थानीय ठेकेदारों की कमी नहीं है, जो यह कार्य बेहतर गुणवत्ता और सस्ती दरों पर कर सकते थे। फिर भी ठेका 250-300 किमी दूर रुद्रपुर की फर्म को दिया गया। यह उत्तराखंड सरकार के मई 2025 के महत्वपूर्ण संशोधन का सीधा उल्लंघन है, जिसमें उत्तराखंड अधिप्राप्ति नियमावली में बदलाव कर 10 करोड़ रुपये तक के सरकारी कार्यों को स्थानीय ठेकेदारों के लिए आरक्षित किया गया था। इस संशोधन का उद्देश्य स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देना और बजट के दुरुपयोग को रोकना था।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि टेंडर की सूचना किसी स्थानीय या राष्ट्रीय अखबार में प्रकाशित नहीं की गई, जो 25 हजार रुपये से अधिक के कार्यों के लिए अनिवार्य है। कोटेशन केवल प्रबंधक के गृह जनपद से लिए गए और स्थानीय बाजार दरों को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया। इससे न केवल सरकारी खजाने को भारी नुकसान हुआ, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और ठेकेदारों को भी झटका लगा। शिकायतकर्ता ने मांग की है कि इस मामले की उच्चस्तरीय जांच हो और दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाएं।